पश्चिम महाराष्ट्र का सवाना: स्वाभाविक पारिस्थितिकी तंत्र
- 02 Jan 2026
1 जनवरी, 2026 को प्रकाशित अध्ययन के संदर्भ में, ब्रिटिश इकोलॉजिकल सोसाइटी की जर्नल पीपल एंड नेचर (People and Nature) में यह निष्कर्ष सामने आया कि पश्चिम महाराष्ट्र के सवाना बिगड़े हुए जंगल नहीं बल्कि सदियों पुराने, स्वाभाविक पारिस्थितिकी तंत्र हैं।
मुख्य तथ्य:
- अध्ययन नेतृत्व: मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के आशीष एन. नेरलेकर और IISER पुणे के दिग्विजय पाटिल ने मध्यकालीन मराठी साहित्य और मौखिक परंपराओं का विश्लेषण कर पारिस्थितिक इतिहास पुनर्निर्मित किया।
- साहित्यिक साक्ष्य: 13वीं–20वीं शताब्दी CE के ग्रंथों से 28 अंश मिले जिनमें हिवर, खैर, तराई, बाभूळ, पालस और पवण्या जैसी सवाना वनस्पतियों का उल्लेख है।
- वनस्पति विश्लेषण: 62 प्रजातियों में 44 सवाना संकेतक, 14 सामान्यवादी और केवल 3 वन संकेतक पाए गए; मोटी छाल, कांटे और पुनर्अंकुरण जैसी अनुकूलन विशेषताएँ दर्ज हुईं।
- ऐतिहासिक शब्दावली: ‘वन’ और ‘जांगल/जागल’ शब्द खुले, सूखे परिदृश्यों को इंगित करते हैं; ‘अनूप’ गीले वनों को दर्शाता है।
- संरक्षण निहितार्थ: अध्ययन ने दिखाया कि खुले पेड़-घास परिदृश्य कम-से-कम 750 वर्षों से स्थायी हैं और इन्हें स्थानीय संस्कृति व जैवविविधता के साथ संरक्षित करना आवश्यक है।
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