हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने से जल संकट का खतरा
- 16 Sep 2026
सितंबर 2026 में जारी एक अध्ययन ने चेतावनी दी है कि हिमालयी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से पूरे हिमालयी क्षेत्र की जल सुरक्षा गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है।
मुख्य बिंदु
- तेज पिघलाव: हाल के दशकों में हिमालयी ग्लेशियरों के द्रव्यमान में कमी की गति काफी बढ़ी है।
- पीक वाटर: ग्लेशियरों के सिकुड़ने के कारण नदी प्रवाह मध्य शताब्दी तक चरम स्तर पर पहुँच सकता है, जिसके बाद इसमें गिरावट आ सकती है।
- हिमनदीय झील जोखिम: हिमनद निवर्तन (Glacier Retreat) से घनी आबादी वाली घाटियों के ऊपर अस्थिर हिमनदीय झीलें बन रही हैं।
- उच्च जोखिम वाली झीलें: भारत में लगभग200 हिमनदीय झीलें उच्च जोखिम वाली मानी गई हैं, जिनमें 56 अत्यधिक उच्च जोखिमवाली हैं।
- निगरानी की कमी: लगभग 40,000 ग्लेशियरों में से केवल21 की स्थल-आधारित निगरानीकी जा रही है।
- क्षेत्रीय विस्तार: हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र अफगानिस्तान से म्यांमार तक 8 देशों में फैला है।
- जल सुरक्षा: ग्लेशियरों में कमी से करोड़ों लोगों के लिए जल उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
- आर्थिक महत्व: हिमालयी क्षेत्र भारत के20% से अधिक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) को समर्थन देता है।
- आपदा संवेदनशीलता: यह क्षेत्र भारत के लगभग 18% भूभाग में फैला है, लेकिन देश की लगभग 35% प्राकृतिक आपदाओंसे प्रभावित होता है।
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