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- 07 Apr 2026
अप्रैल 2026 में, बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (BSIP) के वैज्ञानिकों ने जंगली घासों से फसल के परागकणों (Crop pollen) को अलग पहचानने की एक नई विधि विकसित की है, जो मध्य गंगा के मैदान में कृषि की उत्पत्ति को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान करती है।
मुख्य बिंदु
- वैज्ञानिक चुनौती: फसलों (गेहूं, चावल, जौ, बाजरा) के परागकण बिल्कुल जंगली घास के परागकणों के समान दिखते हैं, जिससे माइक्रोस्कोप के नीचे इनकी सही पहचान करना बहुत मुश्किल होता है।
- अभूतपूर्व विधि: अंतर स्पष्ट करने के लिए दाने के आकार (Grain size) और एनलस (annulus) के व्यास का उपयोग करते हुए एक ‘युग्मित बायोमेट्रिक सीमा’ (Paired biometric threshold) पेश की गई है।
- प्रमुख मापदंड:
- फसल के परागकण: >46 माइक्रोमीटर (दाने का आकार), >9 माइक्रोमीटर (एनलस)।
- जंगली घास के परागकण: इन मानों (values) से कम होते हैं।
- कार्यप्रणाली: प्रकाश और इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी का उपयोग करते हुए अनाज और गैर-अनाज घास की 22 प्रजातियों का गहन विश्लेषण किया गया।
- अध्ययन का क्षेत्र: मध्य गंगा का मैदान, जो प्रारंभिक कृषि और मानव बस्तियों के अध्ययन के लिहाज़ से एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
- अनुसंधान के लिए महत्व: यह विधि प्राचीन कृषि पद्धतियों के सटीक पुनर्निर्माण (Reconstruction) को संभव बनाती है और होलोसीन युग के दौरान वनस्पति में हुए बदलावों और मानवीय प्रभावों को ट्रैक करती है।
- भारत-केंद्रित दृष्टिकोण: यह अध्ययन यूरोपीय मॉडलों पर नहीं, बल्कि पूरी तरह से स्वदेशी डेटा पर आधारित है, जो इसे भारत में अपनी तरह का पहला क्षेत्र-विशिष्ट बेंचमार्क बनाता है।
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