उच्चतम न्यायालय ने PCPNDT अधिनियम के कठोर पालन पर क्यों जोर दिया है?

  • 12 Jun 2026

क्योंकि कानूनी प्रतिबंधों के बावजूद लिंग-चयन और कन्या भ्रूण हत्या की प्रथाएं अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं तथा बेटियों के प्रति सामाजिक पूर्वाग्रह अब भी मौजूद हैं, जिससे बाल लिंगानुपात में असंतुलन बना हुआ है। इसी को ध्यान में रखते हुए उच्चतम न्यायालय ने देश में लिंग-चयन की प्रथाओं के जारी रहने पर गहरी चिंता व्यक्त की है।

वर्तमान संदर्भ

  • 11 जून, 2026 को उच्चतम न्यायालय ने अपने एक निर्णय में कहा कि जब तक बेटियों के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण में बड़ा बदलाव नहीं आता, तब तक ‘गर्भधारण-पूर्व और प्रसव-पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम, 1994’ [PCPNDT Act] को सख्ती से लागू करना अनिवार्य है।

न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियां

  • बेटों के प्रति गहरी पितृसत्तात्मक मानसिकता आज भी समाज में मौजूद है, जिसके कारण कानूनी प्रतिबंधों के बावजूद लिंग-चयन की प्रथाएं धड़ल्ले से चल रही हैं।
  • कई राज्यों में जन्म के समय लिंगानुपात अभी भी राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे है, जो समाज में गहरे तक जमे लैंगिक पूर्वाग्रह को दर्शाता है।
  • कन्या भ्रूण हत्या और लिंग-चयनात्मक प्रथाओं को रोकने तथा बेटियों की सुरक्षा के लिए PCPNDT अधिनियम, 1994 का कड़ाई से पालन कराया जाना बेहद जरूरी है।

बाल लिंगानुपात

  • 1991: प्रति 1,000 लड़कों पर 945 लड़कियां
  • 2001: प्रति 1,000 लड़कों पर 927 लड़कियां
  • 2011: प्रति 1,000 लड़कों पर 919 लड़कियां

PCPNDT अधिनियम, 1994

  • यह अधिनियम लिंग-निर्धारण एवं लिंग-चयन से संबंधित गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाता है।
  • इसका उद्देश्य कन्या भ्रूण हत्या को रोकना तथा बालिकाओं के अधिकारों की रक्षा करना है।
  • भ्रूण के लिंग की जानकारी देना, उसका प्रचार करना अथवा लिंग-चयन हेतु तकनीकों का उपयोग करना दंडनीय अपराध है।