प्लास्टिक से ईंधन प्रौद्योगिकी

  • 17 Oct 2026

भारत प्रतिदिन अनुमानित 26,000 टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न करता है, जो अपशिष्ट प्रबंधन के लिए गंभीर चुनौतियाँ खड़ा करता है।

  • प्लास्टिक-से-ईंधन (Plastic-to-fuel) प्रौद्योगिकी गैर-पुनर्चक्रण योग्य (non-recyclable) प्लास्टिक कचरे के प्रसंस्करण और ऊर्जा की पुनर्प्राप्ति के लिए एक संभावित समाधान प्रदान करती है।

प्लास्टिक-से-ईंधन प्रौद्योगिकी क्या है?

परिचय: प्लास्टिक-से-ईंधन प्रौद्योगिकी थर्मल और रासायनिक (थर्मोकेमिकल) प्रक्रियाओं का उपयोग करके प्लास्टिक कचरे को तरल हाइड्रोकार्बन, दहनशील गैसों और अन्य उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित करती है।

प्लास्टिक-से-ईंधन प्रौद्योगिकी में शामिल 3 विधियाँ:

  1. पायरोलिसिस (Pyrolysis): यह ऑक्सीजन की अनुपस्थिति या नगण्य उपस्थिति में प्लास्टिक को गर्म करके तेल, गैस और ठोस अवशेष तैयार करता है।
  2. उत्प्रेरकीय रूपांतरण (Catalytic Conversion): प्लास्टिक पॉलिमर को तोड़ने और अंतिम उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए उत्प्रेरकों (catalysts) का उपयोग करता है।
  3. गैसीकरण (Gasification): यह उच्च तापमान (800-1,200°C) पर प्लास्टिक कचरे को सिंथेसिस गैस (सिन्नगैस) में परिवर्तित करता है, जिसमें मुख्य रूप से हाइड्रोजन और कार्बन मोनोऑक्साइड शामिल होते हैं।

प्लास्टिक-से-ईंधन प्रौद्योगिकी भारत के कचरा संकट को हल करने में कैसे मदद कर सकती है?

  • कचरे में कमी: कुछ गैर-पुनर्चक्रण योग्य प्लास्टिकों को लैंडफिल (कचरा भराव क्षेत्रों) में जाने से रोकता है।
  • ऊर्जा पुनर्प्राप्ति: संभावित औद्योगिक अनुप्रयोगों के लिए ईंधन और गैसों का उत्पादन करता है।
  • आर्थिक अवसर: कचरा संग्रह, पृथक्करण (segregation) और प्रसंस्करण में रोजगार और व्यवसायों को बढ़ावा देता है।
  • पर्यावरण संरक्षण: उचित रूप से विनियमित सुविधाएं खुले में कचरा फेंकने और अनियंत्रित दहन (जलने) को कम कर सकती हैं।