मासिक धर्म स्वच्छता को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता

  • 31 Jan 2026

30 जनवरी, 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि मासिक धर्म स्वच्छता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और गरिमा के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। इस संबंध में न्यायालय ने राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों और देशभर के विद्यालयों को बाध्यकारी निर्देश जारी किए।

मुख्य बिंदु

  • संवैधानिक मान्यता: अदालत ने कहा कि मासिक धर्म स्वच्छता तक पहुँच गरिमा, स्वास्थ्य और समानता के लिए अनिवार्य है, अतः यह अनुच्छेद 21 के दायरे में आता है।
  • मुफ़्त सैनेटरी नैपकिन: सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया गया है कि प्रत्येक विद्यालय में किशोरियों को जैव-अवक्रमणीय (biodegradable)सेनेटरी नैपकिन निःशुल्क उपलब्ध कराए जाएँ।
  • राष्ट्रीय नीति का कार्यान्वयन: न्यायालय ने कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं के लिए केंद्र सरकार की ‘विद्यालय जाने वाली बालिकाओं हेतु मासिक धर्म स्वच्छता नीति’ को पूरे भारत में लागू करने का आदेश दिया।
  • विद्यालयी अवसंरचना:अधिकारियों को सुनिश्चित करना होगा कि विद्यालयों मेंसुव्यवस्थित, स्वच्छ और लैंगिक रूप से पृथक शौचालय उपलब्ध हों ताकि गोपनीयता और स्वास्थ्य की रक्षा हो सके।
  • शिक्षा और स्वास्थ्य पर प्रभाव:पीठ ने टिप्पणी की कि माहवारी को लेकर सामाजिक कलंक और बुनियादी सुविधाओं की कमी से लड़कियों के स्वास्थ्य, शिक्षा और व्यक्तिगत गरिमा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
  • सभी स्कूलों पर लागू: ये निर्देश सरकारी और निजी दोनों प्रकार के विद्यालयों के लिए अनिवार्य हैं।
  • अनुपालन न होने पर दंड: न्यायालय ने चेतावनी दी कि यदि निजी विद्यालय लड़कियों और लड़कों के लिए पृथक शौचालय उपलब्ध नहीं कराते या निःशुल्क सेनेटरी पैड्स की व्यवस्था नहीं करते, तो उनकी मान्यता समाप्त की जा सकती है।