सामयिक

राष्ट्रीय:

सामाजिक प्रगति सूचकांक

20 दिसंबर, 2022 को प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के अध्यक्ष डॉ. बिबेक देबरॉय द्वारा ‘सामाजिक प्रगति सूचकांक : भारत के राज्य एवं जिले’ (Social Progress Index : States and Districts of India) नामक रिपोर्ट जारी की गई।


  • सूचकांक का विकास: यूएस-आधारित गैर-लाभकारी संस्था 'सोशल प्रोग्रेस इम्पेरेटिव' (Social Progress Imperative) तथा 'इंस्टीट्यूट फॉर कॉम्पिटिटिवनेस' (Institute for Competitiveness) द्वारा विकसित।

सूचकांक के बारे में

  • सामाजिक प्रगति सूचकांक, सामाजिक प्रगति के 3 महत्वपूर्ण आयामों- बुनियादी मानव आवश्यकताओं (Basic Human Needs), कल्याण के आधार (Foundations of Wellbeing) तथा अवसर (Opportunity) में 12 घटकों के आधार पर राज्यों और जिलों का आकलन करता है।
  • सूचकांक एक व्यापक ढांचे का उपयोग करता है जिसमें राज्य स्तर पर 89 संकेतक और जिला स्तर पर 49 संकेतक शामिल हैं।
  • एसपीआई स्कोर के आधार पर, राज्यों और जिलों को सामाजिक प्रगति के 6 स्तरों के तहत रैंक प्रदान की गई है। ये 6 स्तर हैं-
    • टीयर 1: बहुत उच्च सामाजिक प्रगति;
    • टीयर 2: उच्च सामाजिक प्रगति;
    • टीयर 3: ऊपरी मध्य सामाजिक प्रगति;
    • टीयर 4: निम्न मध्य सामाजिक प्रगति,
    • टीयर 5: कम सामाजिक प्रगति और
    • टीयर 6: बहुत कम सामाजिक प्रगति।

प्रमुख निष्कर्ष

  • पुडुचेरी का देश में उच्चतम एसपीआई स्कोर 65.99 है, जिसका श्रेय व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पसंद, आश्रय, और जल और स्वच्छता जैसे घटकों में इसके उल्लेखनीय प्रदर्शन को दिया जाता है। लक्षद्वीप और गोवा क्रमशः 65.89 और 65.53 के स्कोर के साथ दुसरे एवं तीसरे स्थान पर हैं। झारखंड और बिहार ने सबसे कम (क्रमशः 43.95 और 44.47) स्कोर हासिल किया है।
  • पिछले एक दशक में भारत ने उल्लेखनीय आर्थिक प्रगति की है। वर्ष 2011-12 से 2020-21 तक प्रति व्यक्ति जीडीपी में 39.7 से अधिक की वृद्धि हुई है।
  • भारत, वर्तमान में सामाजिक प्रगति सूचकांक में 60.19/100 के स्कोर के साथ विश्व में 110वें स्थान पर है।

आईएनएस मोरमुगाओ भारतीय नौसेना में शामिल

18 दिसंबर, 2022 को परियोजना 15बी (Project 15B) वर्ग के दूसरे युद्धपोत आईएनएस मोरमुगाओ (INS Mormugao) को मुंबई में नौसेना डॉकयार्ड में कमीशन किया गया। इस श्रेणी के पहले जहाज आईएनएस विशाखापट्टनम (INS Visakhapatnam) को नवंबर 2021 में नौसेना में शामिल किया गया था।

आईएनएस मोरमुगाओ के संदर्भ में

  • आरंभ एवं समुद्री परीक्षण: वर्ष 2016 में इस युद्धपोत का जलावतरण तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर द्वारा किया गया था जबकि इसका समुद्री परीक्षण गोवा मुक्ति के 60 वर्ष पूरे होने के अवसर पर वर्ष 2021 में शुरू किया गया था।
  • विशेषता: यह एक स्टील्थ गाइडेड-मिसाइल विध्वंसक युद्धपोत (Stealth guided-missile destroyer) है जो 163 मीटर लंबा और 17 मीटर चौड़ा है।
    • यह अत्याधुनिक हथियारों तथा ‘सतह से सतह’ एवं ‘सतह से हवा’ में मार करने वाली मिसाइलों से सुसज्जित है।
  • नामकरण: पश्चिमी तट पर अवस्थित ऐतिहासिक बंदरगाह शहर 'गोवा' के मोरमुगाओ पतन के नाम पर इस युद्धपोत का नाम 'मोरमुगाओ' रखा गया है।
  • निर्माण: इस युद्धपोत को भारतीय नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो (Warship Design Bureau of the Indian Navy) द्वारा स्वदेशी रूप से डिजाइन किया गया है, जबकि इसके निर्माण का कार्य मुंबई के मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (Mazagon Dock Shipbuilders Limited-MDSL) द्वारा किया गया है।

महत्त्व

  • राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण: आईएनएस मोरमुगाओ सबसे शक्तिशाली स्वदेश निर्मित युद्धपोतों में से एक है, जो देश की समुद्री क्षमताओं को महत्त्वपूर्ण रूप से बढ़ाने और राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित करने में सहायक होगा।
  • उन्नत तकनीक से सुसज्जित: यह विश्व के सबसे तकनीकी रूप से उन्नत मिसाइल वाहकों में से एक है जो परमाणु, जैविक और रासायनिक युद्ध स्थितियों में लड़ने के लिये सुसज्जित है।
  • स्वदेशी तकनीक द्वारा निर्मित: यह युद्धपोत 75% से अधिक स्वदेशी सामग्री से निर्मित है, जो डिजाइन और विकास में भारत की उत्कृष्टता और बढ़ती स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमताओं का एक बेहतरीन उदाहरण है।

प्रोजेक्ट 15बी

  • आरंभ: परियोजना 15बी (Project 15B) के तहत चार युद्धपोतों के निर्माण के लिये वर्ष 2011 में अनुबंध पर हस्ताक्षर किये गए थे। इन सभी युद्धपोतों को वर्ष 2024 तक भारतीय नौसेना में शामिल किये जाने का लक्ष्य रखा गया है।
  • विशेषता: इन्हें विशाखापट्टनम श्रेणी (Visakhapatnam Series) के जहाज़ों के रूप में जाना जाता है। इसके तहत देश में स्वदेशी तकनीक की मदद से विशाखापट्टनम, मोरमुगाओ, इंफाल और सूरत (Visakhapatnam, Mormugao, Imphal and Surat) नामक चार युद्धपोतों का निर्माण किया जाना है।
  • प्रगति: इसके अंतर्गत निर्मित आईएनएस विशाखापट्टनम का वर्ष 2015 में, आईएनएस मोरमुगाओ का वर्ष 2016 में, आईएनएस इंफाल का वर्ष 2019 में तथा आईएनएस सूरत का वर्ष 2022 में जलावतरण किया गया था।

प्रोजेक्ट 15 एवं 15

  • आरंभ: भारत का स्वदेशी विध्वंसक निर्माण कार्यक्रम (Indigenous destroyer building program) 1990 के दशक के अंत में दिल्ली श्रेणी (परियोजना 15) के तीन युद्धपोतों के साथ शुरू हुआ। इसके तहत 'आईएनएस दिल्ली (INS Delhi), आईएनएस मैसूर (INS Mysore) और आईएनएस मुंबई (INS Mumbai)' नामक युद्धपोतों का निर्माण किया गया।
  • अगला चरण: इसके पश्चात् परियोजना 15ए (Project 15A) के तहत कोलकाता वर्ग के तीन युद्धपोतों को भी भारतीय नौसेना में शामिल किया गया। इस श्रेणी के तीन निर्देशित मिसाइल विध्वंसक युद्धपोतों में 'आईएनएस कोलकाता (INS Kolkata), आईएनएस कोच्चि (INS Kochi) और आईएनएस चेन्नई (INS Chennai)' को कमीशन किया गया।
  • निर्माण संस्था: इन सभी स्टील्थ गाइडेड-मिसाइल विध्वंसक युद्धपोतों का निर्माण देश के सबसे महत्त्वपूर्ण रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों में से एक मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDSL) द्वारा किया जा रहा है।

इंडिया इंटरनेट गवर्नेंस फोरम-2022

11 दिसंबर, 2022 को इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी तथा कौशल विकास एवं उद्यमिता राज्य मंत्री ने 'इंडिया इंटरनेट गवर्नेंस फोरम-2022' (India Internet Governance Forum-2022 [IIGF-2022]) के समापन समारोह को संबोधित किया।

  • इंडियाइंटरनेटगवर्नेंस फोरम-2022 की बैठक 9-11 दिसंबर, 2022 के मध्य आयोजित की गई।
  • बैठक की थीम: “भारत के सशक्तीकरण के लिये प्रौद्योगिकी के दशक का उपयोग” (Leveraging Techade for Empowering Bharat)।
  • आयोजन का उद्देश्य: डिजिटलीकरण के रोडमैप पर चर्चा करना तथा इंटरनेट गवर्नेंस पर अंतरराष्ट्रीय नीति विकास में भारत की भूमिका को उजागर करना।

IIGF के संदर्भ में

  • आरंभ: इसकी पहली बैठक वर्ष 2006 में आयोजित की गई थी।
    • इसका गठन संयुक्त राष्ट्र स्थित इंटरनेट गवर्नेंस फोरम (UN-based Internet Governance forum) के ट्यूनिस एजेंडा के IGF-पैराग्राफ 72 (GF-Paragraph 72) के अनुरूप किया गया है।
    • इस प्रकार, इंडिया इंटरनेट गवर्नेंस फोरम (IIGF) वास्तव में संयुक्त राष्ट्र इंटरनेट गवर्नेंस फोरम (UN-IGF) से जुड़ी एक भारतीय पहल है।
  • उद्देश्य/कार्य: यह फोरम इंटरनेट से संबंधित सार्वजनिक नीति के मुद्दों के बारे में चर्चा करने के लिए विभिन्न हितधारकों के लिए एक मंच के रूप में कार्य करता है।
  • प्रकृति: यह फोरम इंटरनेट से संबंधित सार्वजनिक नीति के मुद्दों के विषय में चर्चा करने के लिए विभिन्न समूहों के प्रतिनिधियों को एक मंच पर लाने के लिए एक प्रकार के 'इंटरनेट गवर्नेंस नीति विचार-विमर्श मंच' (Internet Governance Policy Consultation Forum) के रूप में कार्य करता है।

भारत की इंटरनेट कनेक्टिविटी की स्थिति

  • वर्तमान इंटरनेट क्षमता: भारत 800 मिलियन से अधिक उपयोगकर्त्ताओं के साथ विश्व का सबसे बड़ा इंटरनेट कनेक्टिविटी (Internet Connectivity) वाला देश है। साथ ही, भारत को विश्व के दूसरे सबसे बड़े ब्रॉडबैंड सदस्यता वाले देश तथा प्रति उपयोगकर्ता प्रतिमाह सर्वाधिक डेटा की खपत करने वाले देश के रूप में भी जाना जाता है।
  • भविष्य की क्षमता: 5-जी तथा ‘भारत-नेट’ ग्रामीण ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी नेटवर्क परियोजना (Rural Broadband Connectivity Network Project) के तहत आगे चलकर 1.2 अरब भारतीय उपयोगकर्ता होंगे। इस तरह वैश्विक इंटरनेट में भारत सबसे बड़ी उपस्थिति का प्रतिनिधित्व करेगा।
  • अन्य देशों को सहयोग: भारत, वैश्विक दक्षिण (Global South) के देशों के लिये भी इंटरनेट तक पहुंच में सुधार हेतु सहयोग कर रहा है। इनमें वे देश हैं जो अपनी अर्थव्यवस्थाओं के विकास में इन्टरनेट उपयोग तथा डिजिटलीकरण की कमी के कारण अर्थव्यवस्था को आवश्यक गति प्रदान करने में सक्षम नहीं हैं।
    • इंटरनेट के उपयोग एवं कनेक्टिविटी से किसी भी अर्थव्यवस्था को उत्पादकता, वित्तीय स्वतंत्रता और सूचना तक अधिक व्यापक पहुंच संबंधी लाभ प्राप्त होते हैं।

इंटरनेट गवर्नेंस

  • अर्थ एवं परिभाषा: इंटरनेट गवर्नेंस को मुख्यतः सरकारों, निजी क्षेत्र और नागरिक समाज द्वारा साझा सिद्धांतों, मानदंडों, नियमों, निर्णय लेने की प्रक्रियाओं और कार्यक्रमों की अपनी-अपनी भूमिकाओं में इंटरनेट प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग के रूप में परिभाषित किया जाता है।
    • समन्वित रूप में इसके अंतर्गत तकनीकी मानकों के विकास एवं समन्वय, महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे के संचालन तथा इंटरनेट से जुड़े सार्वजनिक नीति के मुद्दों को भी शामिल किया जाता है।
    • इसके तहत वे प्रक्रियाएं भी शामिल की जाती हैं, जिनसे इंटरनेट के विकास और उपयोग को बढ़ावा मिलता है।
  • इंटरनेट गवर्नेंस के क्षेत्र: इंटरनेट गवर्नेंस के अंतर्गत इंटरनेट प्रोटोकॉल एड्रेसिंग (IP Addressing), डोमेन नेम सिस्टम (DNS), रूटिंग, तकनीकी नवाचार, मानकीकरण, सुरक्षा, सार्वजनिक नीति, गोपनीयता, कानूनी मुद्दे, साइबर मानदंड, बौद्धिक संपदा और कराधान संबंधी मुद्दे शामिल हैं।
  • इंटरनेट गवर्नेंस के आयाम: इसके आयामों में भौतिक अवसंरचना, कोड या तार्किक तथ्य, विषय वस्तु तथा सुरक्षा संबंधी विषय आते हैं।

अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र (संशोधन) विधेयक, 2022

14 दिसंबर, 2022 को राज्य सभा द्वारा पारित किये जाने के पश्चात नई दिल्ली अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र (संशोधन) विधेयक, 2022 [New Delhi International Arbitration Centre (Amendment) Bill, 2022] को संसद के दोनों सदनों की मंजूरी प्राप्त हो गई।

  • इसे 8 अगस्त, 2022 को लोक सभा द्वारा पारित किया गया था। यह ‘नई दिल्ली अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र अधिनियम, 2019’ (New Delhi International Arbitration Centre Act, 2019) में संशोधन करता है।
  • मुख्य प्रावधान: यह विधेयक नई दिल्ली अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र का नाम बदलकर "भारत अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र" (India International Arbitration Centre) करने का प्रावधान करता है।
  • विधेयक की आवश्यकता: केंद्र सरकार द्वारा यह महसूस किया गया कि संस्था का वर्तमान नाम शहर-केंद्रित होने का आभास देता है, जबकि यह केंद्र भारत को संस्थागत मध्यस्थता के केंद्र के रूप में उभारने की आकांक्षाओं का प्रतिबिंबित करता है।

विधेयक के अन्य प्रावधान

  • मूल अधिनियम के तहत, नई दिल्ली अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र (NDIAC) को 'अंतरराष्ट्रीय और घरेलू मामलों में 'मध्यस्थता और सुलह' (Arbitration & Conciliation) के संचालन की सुविधा के लिए प्रयास करने के लिए निर्देशित किया गया था। वहीं नवीन संशोधन विधेयक इस प्रक्रिया में वैकल्पिक विवाद समाधान के अन्य रूपों को भी शामिल करने के लिए क़ानून का विस्तार करता है।
  • संशोधन विधेयक के अनुसार मध्यस्थता के संचालन के तरीकों तथा वैकल्पिक विवाद समाधान के अन्य रूपों को केंद्र सरकार द्वारा विभिन्न नियमों के माध्यम से निर्दिष्ट किया जाएगा।
  • 2019 के मूल अधिनियम में केंद्र सरकार को अधिनियम के लागू होने की तारीख से 2 वर्ष के भीतर इसे लागू करने में आने वाली किसी भी कठिनाई को दूर करने की अनुमति दी गई थी। नवीन संशोधन विधेयक इस समय अवधि को 5 वर्ष तक के लिए विस्तारित करता है।

एनडीआईएसी के मुख्य उद्देश्य

  • विवादों के वैकल्पिक समाधान के मामलों से जुड़े शोध को बढ़ावा देना, प्रशिक्षण देना तथा कॉन्फ्रेंस एवं सेमिनार आयोजित करना।
  • मध्यस्थता और सुलह की कार्यवाहियों के लिए सुविधाएं और प्रशासनिक सहयोग प्रदान करना।
  • मध्यस्थता और सुलह की कार्यवाहियों के लिए मान्यता प्राप्त प्रोफेशनलों का पैनल तैयार करना।

वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) क्या है?

  • एडीआर (Alternative Dispute Resolution) विवाद समाधान का एक ऐसा तंत्र है जिसमें संबंधित पक्ष सहयोगपूर्ण तरीके से सर्वोत्तम समाधान तक पहुंचने के लिए आपस में मिलकर काम करते हैं।
  • वैकल्पिक विवाद समाधान, विवाद को हल करने के उन तरीकों को संदर्भित करता है, जो न्यायालयी मुकदमेबाजी के विकल्प हो सकते हैं। इनमें मध्यस्थता, सुलह, समझौता वार्ता, पंचाट तथा लोक अदालत जैसे उपाय शामिल हो सकते हैं।
  • आमतौर पर यह तंत्र, विवाद समाधान की प्रक्रिया में एक तटस्थ तीसरे पक्ष का उपयोग करता है, जो विवाद से संबंधित पक्षों को संवाद करने, मतभेदों पर चर्चा करने तथा विवाद को हल करने में मदद करता है।

वैकल्पिक विवाद समाधान का महत्व

  • समय की बर्बादी से बचाव: एडीआर के माध्यम से लोग अदालतों की तुलना में कम समय में अपने विवाद को सुलझा सकते हैं।
  • लागत प्रभावी: एडीआर की प्रक्रिया काफी कम खर्चीली है, जबकि न्यायालयों में मुकदमेबाजी की प्रक्रिया में काफी खर्च होता है।
  • तकनीकी जटिलता रहित: यह प्रक्रिया अदालतों की तकनीकी जटिलताओं से मुक्त है तथा इसमें विवाद को सुलझाने में अनौपचारिक तरीके अपनाए जाते हैं।
  • मामले के बारे में सही तथ्यों का उजागर होना: चूंकि यह प्रक्रिया अदालती प्रक्रिया की तुलना में अपेक्षाकृत अनौपचारिक प्रकृति की होती है, इसलिए इस प्रक्रिया में विवाद से जुड़े पक्ष अधिक प्रभावी रूप में अपनी बात रख पाते हैं।
  • विवाद का स्वतः निपटान: चूंकि एडीआर की प्रक्रिया में संबंधित पक्ष एक ही मंच पर अपने मुद्दों पर एक साथ चर्चा करते हैं, ऐसे में विवाद के स्वतः निपटान की संभावना भी बढ़ जाती है। साथ ही यह प्रक्रिया पक्षों के बीच संघर्ष को बढ़ने से भी रोकती है।

वैकल्पिक विवाद समाधान की सीमाएं

  • अपील का न होना: वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र के द्वारा दिए गए फैसलों में अपील की गुंजाइश कम या न के बराबर होती है; ऐसे में यदि फैसले के संबंध में कोई समस्या प्रकट होती है, तो उसका समाधान संभव नहीं होता। यानी इसमें अंतिम समाधान की कोई गारंटी नहीं होती।
  • विभिन्न क़ानून: घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के लिए अलग-अलग क़ानूनों के कारण, अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता से संबंधित कानूनों की प्रयोज्यता का पता लगाना मुश्किल होता है।
  • सांस्कृतिक या भाषा संबंधी बाधाएं: दो क्षेत्रों की भाषा एवं संस्कृति में विसंगति के कारण, इस अंतर को पाटना और एक एकीकृत समाधान पर आना मुश्किल हो जाता है।
  • जागरूकता की कमी: अधिकांश लोग अपने विवादों के समाधान के लिए अभी भी अदालतों में जाना पसंद करते हैं और इन विकल्पों और कार्यप्रणाली से अनभिज्ञ हैं।
  • संस्थागत अवसंरचना की कमी: भारत में ADR को बढ़ावा देने के लिए संस्थागत अवसंरचना की कमी है, इसी कारण से इसे लागू करना चुनौतीपूर्ण है।

नागालैंड का हॉर्नबिल फेस्टिवल

1-10 दिसंबर, 2022 के मध्य देश के पूर्वोत्तर राज्य नागालैंड में हॉर्नबिल महोत्सव (Hornbill Festival) के 23वें संस्करण का आयोजन किया गया।

  • इस महोत्सव में कुल 1,40,299 लोगों ने हिस्सा लिया, जिसमें 1,026 विदेशी पर्यटक भी शामिल हुए।
  • हॉर्नबिल महोत्सव का उद्घाटन उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ द्वारा 1 दिसंबर, 2022 को नागालैंड की राजधानी कोहिमा के निकट नागा विरासत गांव 'किसामा' (Kisama) में किया गया था।

हॉर्नबिल फेस्टिवल

  • महोत्सव का उद्देश्य: नागालैंड की समृद्ध संस्कृति को पुनर्जीवित करना व उसकी रक्षा करना तथा इसकी परंपराओं को प्रदर्शित करना।
  • आयोजन का समय: नागालैंड सरकार प्रत्येक वर्ष दिसंबर के पहले सप्ताह में हॉर्नबिल महोत्सव आयोजित करती है।
    • यह महोत्सव नागालैंड के राज्य दिवस के अवसर पर 1 दिसंबर को शुरू होता है, तथा 10 दिनों तक चलने के बाद 10 दिसंबर को समाप्त हो जाता है।
  • आयोजन स्थल: हॉर्नबिल फेस्टिवल, कोहिमा से लगभग 12 किमी. दूर स्थित किसामा (Kisama) के नागा हेरिटेज विलेज (Naga Heritage Village) में आयोजित किया जाता है।
    • हालांकि इसका संगीत समारोह तथा रॉक कॉन्टेस्ट दीमापुर (Dimapur) में आयोजित किया जाता है।
  • आयोजित गतिविधियां: हॉर्नबिल महोत्सव, नृत्य, प्रदर्शन, शिल्प, परेड, खेल, भोजन मेले तथा धार्मिक समारोहों का एक अनूठा मिश्रण है।
  • महत्व: नागालैंड की लगभग सभी जनजातियां इस त्योहार में भाग लेती हैं तथा इसे "त्योहारों का त्योहार" भी कहा जाता है।
    • यह महोत्सव जनजातीय लोगों की संस्कृति और परंपरा को उजागर करता है तथा संघीय भारत में एक अद्वितीय राज्य के रूप में नगालैंड की पहचान को पुष्ट करता है।
  • महोत्सव में हिस्सा लेने वाली 17 जनजातियां: अंगामी (Angami), आओ (Ao), चाकेसांग (Chakhesang), चांग (Chang), दिमासा कचारी (Dimasa Kachari), गारो (Garo), खिआमनियुंगन (Khiamniungan), कोन्याक (Konyak), कूकी (Kuki), लोथा (Lotha), फ़ोम (Phom), पोचरी (Pochury), रेंगमा (Rengma), सांग्तम (Sangtam), सुमी (Sumi), युमचुनग्रू (Yumchungru) तथा ज़ेलियांग (Zeliang)।

पीटी फैक्ट : हॉर्नबिल पक्षी

  • इस महोत्सव का नामकरण हॉर्नबिल पक्षी के नाम पर किया गया है, जो नगालैंड का सबसे श्रद्धेय पक्षी है।
  • ग्रेट हॉर्नबिल, केरल एवं अरुणाचल प्रदेश का राजकीय पक्षी भी है।
  • संरक्षण स्थिति: आईयूसीएन (IUCN) की रेड लिस्ट में सुभेद्य श्रेणी के रूप में वर्गीकृत है,
    • साइट्स (CITES) के परिशिष्ट I के अंतर्गत सूचीबद्ध है; तथा
    • वन्यजीव संरक्षण अधिनियम,1972 की अनुसूची 1 में शामिल है।

बिहार सरकार की ‘हर घर गंगाजल’ योजना

27 नवंबर, 2022 को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नालंदा जिले के राजगीर से 'हर घर गंगाजल योजना' का शुभारंभ किया। इस योजना को दिसंबर 2019 में बिहार कैबिनेट की मंजूरी प्राप्त हुई थी।

  • इस योजना को राज्य सरकार की ‘जल, जीवन, हरियाली योजना’ के तहत आरंभ किया गया है।
  • योजना के तहत गंगा नदी के अधिशेष जल को दक्षिण बिहार के जल संकट वाले क्षेत्रों (मुख्य रूप से शहरों) में ले जाकर पेयजल के रूप में इस्तेमाल करने की अनूठी परिकल्पना पेश की गई है।
  • योजना के तहत, प्रत्येक व्यक्तिगत लाभार्थी को पेयजल तथा घरेलू उद्देश्यों के लिए प्रतिदिन 135 लीटर (दो बड़ी बाल्टी) गंगा जल प्राप्त होगा।

योजना की शुरुआत क्यों की गई है?

  • धार्मिक और पर्यटन के लिए प्रसिद्ध नालंदा, गया और बोधगया में प्रति वर्ष लाखों देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं, किंतु इन शहरों में गर्मियों में पेयजल की कमी हो जाती है।
  • इस परियोजना का उद्देश्य इन्ही दक्षिणी क्षेत्रों में उपचारित गंगा जल की आपूर्ति करना है।

योजना का कार्यान्वयन

  • योजना का पहला चरण 4,000 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ लागू किया जा रहा है। इस चरण के तहत राजगीर, बोधगया तथा गया में लगभग 7.5 लाख घरों में जल की आपूर्ति हेतु बड़े पंपों के माध्यम से हाथीदह (मोकामा के पास) से जल एकत्र किया जाएगा।
  • एकत्रित जल को आरंभ में राजगीर और गया में जलाशयों में संग्रहीत किया जाएगा। तत्पश्चात, इस जल को तीन उपचार एवं शुद्धिकरण संयंत्रों में भेजा जाएगा।
  • इस योजना के तहत राजगीर शहर के 19 वार्डों के करीब 8031 घरों, गया शहर के 53 वार्डों के करीब 75000 घरों और बोधगया शहर के 19 वार्डों के करीब 6000 घरों में शुद्ध पेयजल के रूप में गंगाजल की आपूर्ति की जाएगी। योजना के तहत प्रतिव्य क्ति प्रतिदिन 135 लीटर शुद्ध जल की आपूर्ति का लक्ष्य है।
  • इस परियोजना के दूसरे चरण के वर्ष 2023 में आरंभ होने की संभावना है। इससे नवादा जनपद को गंगा जल प्रदान किया जाएगा।

महत्व

  • यह प्रथम बार है जब देश में गंगा नदी के बाढ़ के अतिरिक्त जल को पेयजल के रूप में परिवर्तित करके लगभग 7.5 लाख लोगों को पेयजल उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है।
  • बिहार सरकार की ओर से वर्ष 2051 तक की जनसंख्या वृद्धि का अनुमान लगाते हुए इस परियोजना का निर्माण किया गया है। आने वाले समय में इस परियोजना से लगभग 25 लाख से अधिक लोगों को लाभ प्राप्त होने का अनुमान लगाया गया है।

लाचित बोरफुकन की 400वीं जयंती

23 नवंबर, 2022 को नई दिल्ली में अहोम साम्राज्य के सेनापति 'लाचित बोरफुकन' (Lachit Borphukan) की 400वीं जयंती के 3 दिवसीय समारोह की शुरुआत की गई।

  • केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन ने इस अवसर पर विज्ञान भवन में प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। इस प्रदर्शनी में अहोम साम्राज्य और लाचित बोरफुकन तथा अन्य वीरों की जीवन उपलब्धियां दिखाई गईं।

लाचित बोरफुकन कौन थे?

  • अहोम राजाओं (Ahom kings) की पहली राजधानी चराइदेव (Charaideo) में 24 नवंबर, 1622 को उनका जन्म हुआ था।
  • लाचित बोरफुकन वर्तमान के असम में स्थित अहोम साम्राज्य (Ahom dynasty) के सेनापति थे।
  • उन्होंने मुगल सेना के खिलाफ दो लड़ाइयों का नेतृत्व किया- सराईघाट का युद्ध (Battle of Saraighat) तथा अलाबोई का युद्ध (Battle of Alaboi)।
  • उन्हें सराईघाट के युद्ध (1671) में अनुकरणीय सैन्य नेतृत्व के लिए जाना जाता है।
  • लाचित बोरफुकन अपनी महान नौ-सैन्य रणनीतियों के लिए लिए जाने गए। उनके द्वारा पीछे छोड़ी गई विरासत ने भारतीय नौसेना को मजबूत करने तथा अंतर्देशीय जल परिवहन को पुनर्जीवित करने के पीछे प्रेरणा के रूप में काम किया।
  • लाचित बोरफुकन के पराक्रम और सराईघाट की लड़ाई में असमिया सेना की विजय का स्मरण करने के लिए संपूर्ण असम राज्य में प्रति वर्ष 24 नवंबर को लाचित दिवस (Lachit Diwas) मनाया जाता है।

सराईघाट का नौसैनिक युद्ध (1671 ईस्वी)

  • सराईघाट का युद्ध मुगल साम्राज्य और अहोम साम्राज्य के बीच लड़ा गया एक नौसैनिक युद्ध था।
  • इस युद्ध में लाचित बोरफुकोन के वीरतापूर्ण नेतृत्व के कारण मुगलों की निर्णायक हार हुई।
  • उन्होंने इलाके के शानदार उपयोग, गुरिल्ला रणनीति, सैन्य आसूचना तथा मुगल सेना की एकमात्र कमजोरी 'नौसेना' का फायदा उठाकर मुगल सेना को हराया।
  • सरायघाट की लड़ाई गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र के तट पर लड़ी गई थी।

अलाबोई का युद्ध (1669 ईस्वी)

  • यह युद्ध 5 अगस्त, 1669 को उत्तरी गुवाहाटी में दादरा के पास अलाबोई हिल्स (Alaboi Hills) में लड़ा गया। औरंगजेब ने वर्ष 1669 में 'राजपूत राजा राम सिंह प्रथम' (Rajput Raja Ram Singh I) के अधीन आक्रमण का आदेश दिया, जिन्होंने एक संयुक्त मुगल और राजपूत सेना का नेतृत्व किया।
  • बोरफुकन, गुरिल्ला युद्ध का सहारा लेते हुए, मुग़ल-राजपूत सेना पर बार-बार हमले करते रहे, जब तक कि राम सिंह प्रथम ने अहोमों पर अपनी पूरी सेना लगाकर उन्हें हरा नहीं दिया। अहोमों को इस युद्ध में गंभीर पराजय का सामना करना पड़ा और उनके हजारों सैनिक मारे गए।

अहोम साम्राज्य (1228-1826)

  • यह असम में ब्रह्मपुत्र घाटी में एक 'उत्तर मध्यकालीन' साम्राज्य था। अहोम राजाओं की राजधानी शिवसागर ज़िले में वर्तमान जोरहाट के निकट गढ़गाँव में थी।
  • अहोम राजाओं ने 13वीं और 19वीं शताब्दी के मध्य, वर्तमान असम एवं पड़ोसी राज्यों में स्थित क्षेत्र के एक बड़े हिस्से पर शासन किया।
  • यह साम्राज्य लगभग 600 वर्षों तक अपनी संप्रभुता बनाए रखने और पूर्वोत्तर भारत में मुगल विस्तार का सफलतापूर्वक विरोध करने के लिए जाना जाता है।
  • मुग़लों द्वारा पूरे भारत पर अपना अधिकार कर लेने के बावजूद असम में अहोम राज्य 6 शताब्दी (1228-1835 ई.) तक क़ायम रहा। इस अवधि में 39 अहोम राजा गद्दी पर बैठे।
  • इसकी स्थापना मोंग माओ (Mong Mao) के एक ताई राजकुमार 'सुकाफा' (Tai prince 'Sukaphaa') ने की थी।
  • 16वीं शताब्दी में सुहंगमुंग (Suhungmung) के तहत राज्य का अचानक विस्तार हुआ और यह राज्य चरित्र में बहु-जातीय बन गया, जिसने संपूर्ण ब्रह्मपुत्र घाटी के राजनीतिक और सामाजिक जीवन पर गहरा प्रभाव डाला।

जनजातीय गौरव दिवस तथा बिरसा मुंडा

15 नवंबर, 2022 को बिरसा मुंडा की जयंती के अवसर पर पूरे देश में जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाया गया।

  • सरकार ने बहादुर आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति में 15 नवंबर को 'जनजातीय गौरव दिवस' मनाए जाने की घोषणा पिछले साल 10 नवंबर, 2021 को की थी।
  • बिरसा मुंडा को देश भर के जनजातीय समुदाय द्वारा भगवान के रूप में सम्मान दिया जाता है।

जीवन परिचय

  • बिरसा मुंडा देश के एक प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और श्रद्धेय जनजातीय नायक थे, जिन्होंने ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार की शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई लड़ी।
  • उनका जन्म 15 नवंबर, 1875 को तत्कालीन बंगाल प्रेसीडेंसी के लोहारदगा जिले के उलिहतु गांव (जो वर्तमान में झारखंड के खुंटी जिले में स्थित है) में हुआ था।
  • बिरसा ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने शिक्षक जयपाल नाग के मार्गदर्शन में प्राप्त की। जयपाल नाग की सिफारिश पर, बिरसा ने जर्मन मिशन स्कूल में शामिल होने के लिए ईसाई धर्म अपना लिया।
  • ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों तथा मिशनरियों द्वारा आदिवासियों को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने के मिशनरियों के प्रयासों के बारे में जानने के पश्चात बिरसा ने ‘बिरसैत’ (Birsait) की आस्था शुरू की।
  • जल्द ही मुंडा और उरांव समुदाय के सदस्य बिरसैत संप्रदाय में शामिल होने लगे तथा धर्मांतरण गतिविधियों को रोकने का प्रयास किया।

योगदान

  • 1886 से 1890 की अवधि के दौरान, बिरसा मुंडा ने ‘चाईबासा’(Chaibasa) में काफी समय बिताया, जो ‘सरदारों के आंदोलन’(sardar's Agitation) के करीब था।
  • सरदारों के इस आंदोलन का युवा बिरसा के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा, जिससे प्रभावित होकर उन्होंने मिशनरी विरोधी और सरकार विरोधी प्रदर्शनों की तैयारी प्रारंभ की।
  • बिरसा ने आदिवासियों को ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा कृषि भूमि पर कब्जे के माध्यम से किए जा रहे शोषण के संबंध में जागरूक करने का प्रयास किया ताकि उन्हें क्रांतिकारी संघर्ष के लिए तैयार किया जा सके।
  • मिशनरियों तथा ब्रिटिश सरकार का विरोध करने के कारण बिरसा को 24 अगस्त, 1895 को गिरफ्तार कर लिया गया तथा दो साल की कैद की सजा सुनाई गई। 28 जनवरी, 1898 को जेल से रिहा होने के पश्चात उन्होंने अपने अनुयायियों को संघर्ष के लिए एकत्रित करना प्रारंभ किया।
  • उन्होंने जनजातियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझने और एकता का पालन करने के लिए प्रोत्साहित किया।

उलगुलान विद्रोह

  • उन्होंने जनजातियों से "उलगुलान" (विद्रोह) का आह्वान किया तथा जनजातीय आंदोलन को संगठित करने के साथ नेतृत्व प्रदान किया।
  • मुंडा विद्रोह ‘उलगुलान’ की शुरुआत 1899-1900 के दौरान रांची के आस-पास के क्षेत्रों में हुई। इस विद्रोह का उद्देश्य ब्रिटिश राज को समाप्त कर ‘मुंडा शासन’ की स्थापना करना था।
  • विद्रोह के दौरान मुंडा आदिवासियों ने पुलिस स्टेशनों, सार्वजनिक संपत्तियों, चर्चों तथा जमीदारों को निशाना बनाया।
  • वर्ष 1900 तक मुंडा विद्रोह को दबा दिया गया। 9 जून, 1900 को बिरसा मुंडा की जेल में हैजा होने से मृत्यु हो गई।

आचार्य जे.बी. कृपलानी की जयंती

11 नवंबर, 2022 को आचार्य जे. बी. कृपलानी (11 नवंबर 1888 – 19 मार्च 1982) की जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री द्वारा इन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

आचार्य कृपलानी (पूरा नाम- जीवटराम भगवानदास कृपलानी) का जन्म 11 नवंबर, 1888 को ब्रिटिश भारत काल में तात्कालिक बॉम्बे प्रेसीडेंसी के हैदराबाद शहर में हुआ था, जो वर्तमान में पाकिस्तान के सिंध प्रांत में स्थित है।

संक्षिप्त परिचय

  • आचार्य कृपलानी भारत के प्रमुख भारतीय शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरणवादी और राजनीतिज्ञ थे।
  • वे महात्मा गांधी के करीबी सहयोगी और उनकी विचारधारा के लंबे समय से समर्थक थे।
  • गुजरात विद्यापीठ में पढ़ाने के दौरान उन्हें महात्मा गांधी द्वारा 'आचार्य' उपनाम प्रदान किया गया था।

योगदान

  • बिहार में नील की खेती करने वाले किसानों की दशा सुधारने से संबंधित चंपारण सत्याग्रह में आचार्य कृपलानी ने गाँधी जी का साथ दिया था|
  • वे नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में काफी सक्रियता से शामिल थे।
  • आचार्य कृपलानी ने भारत की अंतरिम सरकार (1946-1947) और भारत की संविधान सभा में प्रमुख जिम्मेदारी निभाई थी।
  • वे सन् 1947 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे जब भारत को आजादी मिली। कृपलानी जी एक दशक से अधिक समय तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के शीर्ष पदों पर आसीन रहे|

स्वतंत्रता के पश्चात

  • उन्होंने जवाहरलाल नेहरू की उन नीतियों का विरोध किया, जो उनके अनुसार गांधीवादी मूल्यों के खिलाफ थीं|
  • कृपलानी जी ने इंदिरा गांधी सरकार की विभिन्न नीतियों का भी विरोध किया।
  • आचार्य कृपलानी ने 1977 में जनता पार्टी की सरकार के गठन में अहम भूमिका निभायी। आचार्य कृपलानी गांधीवादी दर्शन के एक प्रमुख व्याख्याता थे और उन्होंने इस विषय पर अनेक पुस्तकें लिखीं।

भारत के 50वें सीजेआई : न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़

9 नवंबर, 2022 को न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़ ने भारत के 50वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) के रूप में शपथ ग्रहण किया। उन्हें उनकी पद की शपथ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा दिलाई गई।

  • न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ का अपेक्षाकृत दो वर्ष का लंबा कार्यकाल होगा और वे 10 नवंबर, 2024 को सेवानिवृत्त होंगे।
  • जस्टिस चंद्रचूड़ भारत के 16वें चीफ जस्टिस वाई. वी. चंद्रचूड़ के बेटे हैं। उनके पिता का बतौर सीजेआई करीब 7 वर्ष एवं 4 महीने का कार्यकाल रहा था। जो कि सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में किसी सीजेआई का अब तक सबसे लंबा कार्यकाल है।

प्रधान न्यायाधीश की नियुक्ति की प्रक्रिया

  • भारतीय संविधान में प्रधान न्यायाधीश (CJI) की नियुक्ति के संबंध में किसी "प्रक्रिया" का उल्लेख नहीं किया गया है।
  • संविधान का अनुच्छेद 124 (1) केवल यह कहता है कि भारत का एक सर्वोच्च न्यायालय होगा, जो भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा अन्य न्यायाधीशों से मिलकर बनेगा।
  • अनुच्छेद 124 का खंड (2) कहता है कि सर्वोच्च न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी।
  • इस प्रकार, नियुक्ति की प्रक्रिया से संबंधित स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान के अभाव में, सीजेआई की नियुक्ति की प्रक्रिया परंपरा पर निर्भर करती है
  • यह एक प्रथा या परंपरा रही है कि निवर्तमान सीजेआई वरिष्ठता के आधार पर अपने उत्तराधिकारी की सिफारिश करते हैं। हालांकि, दो बार इस प्रथा का उल्लंघन भी हुआ है।

राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति

  • अनुच्छेद 124 के खंड (2) के तहत भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
  • इसी प्रकार अनुच्छेद 217 उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित है, जो यह कहता है कि राष्ट्रपति, भारत के मुख्य न्यायाधीश, संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और राज्यपाल से परामर्श के पश्चात उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करेगा।
  • भारत के मुख्य न्यायाधीश का कार्यकाल 65 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक होता है, जबकि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के संबंध में यह आयु सीमा 62 वर्ष है।

न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने संबंधी योग्यताएं

  • अनुच्छेद 124 (3) के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिए व्यक्ति में निम्नलिखित योग्यताएं होनी चाहिए:
  • वह भारत का नागरिक हो तथा
  • किसी उच्च न्यायालय का या ऐसे दो या अधिक न्यायालयों का लगातार कम से कम 5 वर्ष तक न्यायाधीश रहा हो या
  • किसी उच्च न्यायालय का या ऐसे दो या अधिक न्यायालयों का लगातार कम से कम 10 वर्ष तक अधिवक्ता रहा हो; या
  • राष्ट्रपति की राय में पारंगत विधिवेत्ता हो।

प्रधान न्यायाधीश (CJI) के कार्य

  • मामलों का आवंटन:
    • सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख के रूप में सीजेआई मामलों के आवंटन और संवैधानिक पीठों की नियुक्ति के लिए जिम्मेदार है जो कानून के महत्वपूर्ण मामलों से निपटती हैं।
    • संविधान के अनुच्छेद 145 और सुप्रीम कोर्ट के प्रक्रिया नियम 1966 के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश अन्य न्यायाधीशों को सभी कार्य आवंटित करता है।
  • प्रशासनिक दायित्व: प्रशासनिक रूप से सीजेआई निम्नलिखित कार्य करता है:
    • रोस्टर का रखरखाव;
    • न्यायालय के अधिकारियों की नियुक्ति और
    • सर्वोच्च न्यायालय के पर्यवेक्षण और कामकाज से संबंधित सामान्य और विविध मामलों को देखना।
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