केरल में मेगालिथिक लैटराइट शैल-कट कक्ष की खोज

  • 14 Mar 2026

हाल ही में केरल के कासरगोड जिले में एक महत्वपूर्ण मेगालिथिक लैटराइट शैल-कट कक्ष की खोज की गई है।

  • यह खोज क्षेत्र की प्रागैतिहासिक शवादाह प्रथाओं और भौतिक संस्कृति के बारे में नई जानकारी प्रदान करती है।

मुख्य बिंदु

  • यह कक्ष एक बड़े शवादाह परिसर का हिस्सा है, जहाँ विभिन्न आकारों और प्रकारों के मृदभांड अनुष्ठानिक प्रथाओं के अंतर्गत रखे गए थे।
  • केरल और आसपास के क्षेत्रों में इन संरचनाओं को विभिन्न स्थानीय नामों से जाना जाता है: मुनियारा (संन्यासी की कुटिया), पांडव गुफा (पौराणिक पांडवों से जुड़ी गुफा), पीरांकी गुफा (तोप गुफा), निधिकुज़ी (खजाने वाला गड्ढा), कल्प्पथायम (पत्थर का बक्सा या कोठार)।
  • मेगालिथिक संस्कृति (Megalithic Culture) प्रागैतिहासिक काल की वह परंपरा है, जिसमें बड़े पत्थरों से बनी संरचनाएँ (मेगालिथ) निर्मित की जाती थीं।
  • ये संरचनाएँ मुख्यतः शवादाह स्थलों के रूप में उपयोग की जाती थीं।
  • सामान्यतः इन्हें आवासीय क्षेत्रों से दूर बनाया जाता था।
  • पुरातात्विक साक्ष्यों के अनुसार दक्षिण भारत की मेगालिथिक संस्कृति लगभग 1000 ईसा पूर्व से 100 ईस्वी तक विद्यमान रही।
  • इसकी चरम गतिविधि 600 ईसा पूर्व से 100 ईस्वी के बीच रही।
  • इस काल में क्षेत्र में पूर्ण विकसित लौह युगीन संस्कृति विकसित हो चुकी थी।
  • इस दौरान लौह प्रौद्योगिकी का व्यापक उपयोग किया गया।
  • प्राप्त अवशेष: लौह हथियार, कृषि उपकरण।
  • भौगोलिक विस्तार: मेगालिथिक संस्कृति का मुख्य केंद्र दक्कन क्षेत्र था, विशेषकर गोदावरी नदी के दक्षिण में।
  • प्रमुख स्थल:
    • कर्नाटक: ब्रह्मगिरि, चंद्रावली।
    • महाराष्ट्र: जुनापानी, खापा, मुहुरझरी।
    • तमिलनाडु: आदिचनल्लूर।
    • अन्य क्षेत्र: पंजाब का मैदानी क्षेत्र, राजस्थान, गुजरात, बुर्जाहोम, जम्मू और कश्मीर।