निजी स्कूलों में अनिवार्य RTE प्रवेश पर SC की मुहर
- 29 Apr 2026
28 अप्रैल, 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि गैर-सहायता प्राप्त निजी स्कूलों के लिए शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के तहत चयनित छात्रों को बिना देरी प्रवेश देना कानूनी रूप से अनिवार्य है। न्यायालय ने RTE के प्रभावी क्रियान्वयन को समानता और सामाजिक परिवर्तन के लिए एक राष्ट्रीय मिशन बताया।
मुख्य बिंदु
- अनुच्छेद 21A का संरक्षण: न्यायालय ने कहा कि पात्र छात्रों को प्रवेश से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 21A के तहत प्रदत्त निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
- 25% आरक्षण की पुनः पुष्टि: निर्णय में यह दोहराया गया कि पड़ोस के स्कूलों, जिनमें निजी गैर-सहायता प्राप्त संस्थान भी शामिल हैं, को आर्थिक रूप से कमजोर एवं वंचित वर्गों के लिए 25% सीटें आरक्षित रखना अनिवार्य है।
- राष्ट्रीय मिशन के रूप में RTE: न्यायालय ने कहा कि RTE का प्रभावी क्रियान्वयन भारत की सामाजिक संरचना में बदलाव लाने और समानता स्थापित करने की क्षमता रखता है।
- देरी या इनकार अस्वीकार्य: निजी स्कूलों को राज्य प्राधिकरण द्वारा आवंटित छात्रों को तत्काल प्रवेश देना होगा, और वे किसी प्रकार की प्रक्रियात्मक बाधाएँ नहीं खड़ी कर सकते।
- सरकारी निर्णय अंतिम: एक बार जब राज्य सरकार चयनित छात्रों की सूची जारी कर देती है, तो स्कूल उनकी पात्रता पर प्रश्न नहीं उठा सकते और न ही उसे निरस्त कर सकते हैं।
- मामले की पृष्ठभूमि: यह फैसला लखनऊ स्थित एक निजी स्कूल की उस अपील को खारिज करते हुए आया, जिसने RTE के तहत चयनित छात्र को प्रवेश देने से इंकार कर दिया था।
- अवरोध के विरुद्ध चेतावनी: न्यायालय ने चेताया कि यदि प्रवेश में बाधा डाली गई, तो शिक्षा का संवैधानिक वादा केवल एक “खाली वादा” बनकर रह जाएगा।
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