सामयिक - 09 June 2026
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सिपरी ईयरबुक 2026 के अनुसार वैश्विक सैन्य परिदृश्य में भारत की स्थिति क्या है?
8 जून, 2026 को जारी सिपरी ईयरबुक 2026 के अनुसार, भारत ने विश्व के 5वें सबसे बड़े सैन्य व्ययकर्ता तथा प्रमुख हथियारों के दूसरे सबसे बड़े आयातक के रूप में अपनी स्थिति बरकरार रखी है। साथ ही, भारत सैन्य आधुनिकीकरण, परमाणु प्रतिरोधक क्षमता के सुदृढ़ीकरण तथा रक्षा निर्यात में वृद्धि के माध्यम से एक प्रमुख सामरिक शक्ति के रूप में उभर रहा है।
सैन्य व्यय
- वर्ष 2025 में भारत का सैन्य व्यय 92.1 बिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग ₹7.7 लाख करोड़) रहा।
- यह पिछले वर्ष की तुलना में 8.9% अधिक है।
वैश्विक रैंकिंग
- सैन्य व्यय के मामले में भारत विश्व में 5वें स्थान पर रहा।
- भारत से आगे केवल संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, रूस और जर्मनी हैं।
हथियारों का आयात
- वर्ष 2021-2025 के दौरान भारत प्रमुख हथियारों का विश्व का दूसरा सबसे बड़ा आयातक रहा।
- वैश्विक हथियार आयात में उसकी हिस्सेदारी 8.2% दर्ज की गई।
पाकिस्तान से तुलना
- पाकिस्तान 4.2% हिस्सेदारी के साथ वैश्विक हथियार आयातकों में 5वें स्थान पर रहा।
- इस अवधि में भारत का हथियार आयात पाकिस्तान की तुलना में लगभग दोगुना था।
परमाणु क्षमता
- सिपरी के अनुसार, जनवरी 2026 तक भारत के पास लगभग 190 परमाणु आयुध (Nuclear Warheads) थे।
- भारत ने वर्ष 2025 में अपने परमाणु शस्त्रागार का और विस्तार किया तथा नए परमाणु प्रक्षेपण प्रणालियों के विकास को जारी रखा।
रक्षा निर्यात में वृद्धि
- वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात 4 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक रहा।
- पिछले वर्ष की तुलना में रक्षा निर्यात में 60% से अधिक वृद्धि दर्ज की गई।
निष्कर्ष
सिपरी ईयरबुक 2026 दर्शाती है कि भारत केवल एक बड़ा रक्षा आयातक ही नहीं, बल्कि सैन्य आधुनिकीकरण, परमाणु प्रतिरोधक क्षमता और रक्षा निर्यात के क्षेत्र में निरंतर प्रगति करते हुए एक प्रभावशाली वैश्विक सामरिक शक्ति के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है।
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विश्व के महासागरों में एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी जीन की उपस्थिति चिंता का विषय क्यों है?
जून 2026 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी जीन (ARGs) विश्व के प्रमुख महासागरों में व्यापक रूप से मौजूद हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि हमारे महासागर जमीनी प्रदूषण के वैश्विक भंडार बनते जा रहे हैं, जिससे एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी जीनों का प्रसार बढ़ सकता है और भविष्य में सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौतियां उत्पन्न हो सकती हैं।
वैश्विक उपस्थिति
- एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी जीन (ARGs) की पहचान भूमध्य सागर, अटलांटिक महासागर, आर्कटिक महासागर सहित अनेक प्रमुख समुद्री क्षेत्रों में की गई।
- ये जीन दूरस्थ समुद्री क्षेत्रों में भी पाए गए, जहां प्रत्यक्ष मानवीय गतिविधियां सीमित हैं।
अधिक सांद्रता वाले क्षेत्र
- प्रमुख अंतरराष्ट्रीय नौवहन मार्गों के आसपास।
- घनी आबादी वाले तटीय क्षेत्रों में।
- शहरी अपशिष्ट एवं प्रदूषित जल के निर्वहन से प्रभावित क्षेत्रों में।
महासागरों की भूमिका
- महासागर स्थल-आधारित प्रदूषकों के लिए एक वैश्विक अवशोषक (Global Sink) के रूप में कार्य करते हैं।
- वे एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी जीनों को उनके मूल स्रोतों से दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुंचाने में सक्षम हैं।
सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी चिंता
- इन जीनों का प्रसार समुद्री जीवों एवं पारितंत्रों के माध्यम से नए क्षेत्रों तक हो सकता है।
- इससे मानव समुदायों में एंटीबायोटिक प्रतिरोध के फैलने का जोखिम बढ़ सकता है, जिससे संक्रमणों के उपचार में कठिनाई उत्पन्न हो सकती है।
अन्य प्रमुख निष्कर्ष
- अध्ययन में माइक्रोप्लास्टिक्स की उपस्थिति भी दर्ज की गई।
- फॉरएवर केमिकल्स (PFAS) जैसे दीर्घकालिक रसायनों की पहचान हुई।
- SARS-CoV-2 के आनुवंशिक पदार्थ के अंश भी समुद्री नमूनों में पाए गए।
निष्कर्ष
यह अध्ययन संकेत देता है कि एंटीबायोटिक प्रतिरोध अब केवल स्थलीय पर्यावरण तक सीमित समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह समुद्री पारितंत्रों तक फैलकर एक वैश्विक पर्यावरणीय एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती का रूप ले रहा है।| हाल ही में लॉन्च किया गया ‘भव्य’ पोर्टल किस क्षेत्र को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है? -- यह औद्योगिक विकास, विनिर्माण विस्तार और निवेश संवर्धन को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है |
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