सामयिक - 08 June 2026

सामयिक खबरें राष्ट्रीय

केंद्र ने खाद्य तेलों के लिए ‘मानक पैक आकार’ अधिसूचित किए


6 जून, 2026 को उपभोक्ता मामलों के विभाग ने उपभोक्ताओं के लिए पारदर्शिता, एकरूपता और कीमतों की तुलना को आसान बनाने के उद्देश्य से ‘विधिक मापविज्ञान’ (Legal Metrology) ढांचे के अंतर्गत खाद्य तेलों एवं वसा के लिए ‘मानक पैक आकार’ (Standard Pack Sizes) अधिसूचित किए।

मुख्य बिंदु

  • विधिक मापविज्ञान सुधार: उपभोक्ता मामलों के विभाग ने खाद्य तेलों एवं वसा की शुद्ध मात्रा तथा मानक पैक आकारों के निर्धारण से संबंधित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) में संशोधन किया है।
  • मुख्य उद्देश्य: इस कदम का उद्देश्य बाजार में मनमाने और अलग-अलग पैकेट आकारों (जैसे 850ml, 910ml आदि) की भरमार को रोकना है, जिससे उपभोक्ताओं के लिए विभिन्न ब्रांडों के बीच कीमतों की तुलना करना और सोच-समझकर खरीदारी का निर्णय लेना आसान हो सके।
  • दायरे में आने वाले प्रमुख खाद्य तेल: यह मानकीकरण बाजार में बिकने वाले सभी प्रमुख खाद्य तेलों पर लागू होगा, जिनमें शामिल हैं:
    • पाम ऑयल और पामोलिन
    • सोयाबीन तेल
    • सूरजमुखी का तेल
    • सरसों का तेल
    • मूंगफली का तेल
    • तिल का तेल
    • राइस ब्रान ऑयल
    • बिनौला तेल
    • मक्का तेल
  • उपभोक्ताओं को मिलने वाले लाभ: अलग-अलग ब्रांडों के बीच कीमतों की तुलना करना बेहद आसान हो जाएगा।
    • खुदरा बाजारों (Retail Markets) में पारदर्शिता बढ़ेगी।
    • पैकेट पर भ्रामक मात्रा लिखकर उपभोक्ताओं को ठगने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी।

सामयिक खबरें विज्ञान प्रौद्योगिकी

क्या रक्त में पाए गए नए प्रोटीन संकेतकों से फेफड़ों के कैंसर का जोखिम वर्षों पहले पता लगाया जा सकता है?


हां। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (UCL) और फ्रांसिस क्रिक इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने रक्त में 14-प्रोटीन आधारित एक नए ‘ब्लड सिग्नेचर’ की पहचान की है, जो किसी व्यक्ति में फेफड़ों के कैंसर के विकसित होने के जोखिम का अनुमान वास्तविक निदान से 5 वर्ष से भी पहले लगा सकता है।

क्या है पूरा घटनाक्रम?

  • जून 2026 में प्रकाशित इस अध्ययन ने फेफड़ों के कैंसर की शीघ्र पहचान और समय रहते निवारक हस्तक्षेप की दिशा में महत्वपूर्ण संभावना प्रस्तुत की है।
  • शोधकर्ताओं का मानना है कि यह खोज बीमारी विकसित होने से पहले ही जोखिम वाले व्यक्तियों की पहचान करने में सहायक हो सकती है।

कैसे की गई यह खोज?

  • वैज्ञानिकों ने 'यूके बायोबैंक' के 48,000 से अधिक रक्त नमूनों का मशीन लर्निंग के माध्यम से विश्लेषण कर ऐसे बायोमार्करों की पहचान की, जो भविष्य में फेफड़ों के कैंसर के जोखिम से जुड़े हैं।
  • अध्ययन के निष्कर्षों का परीक्षण 8 अंतरराष्ट्रीय डेटासेट्स पर किया गया, जिनमें धूम्रपान करने वाले तथा धूम्रपान न करने वाले दोनों प्रकार के प्रतिभागी शामिल थे।

यह प्रोटीन सिग्नेचर क्या दर्शाता है?

  • शोध के अनुसार यह सिग्नेचर किसी मौजूदा ट्यूमर से उत्पन्न संकेतों को नहीं, बल्कि फेफड़ों में कैंसर विकसित होने से पहले बनने वाली परिवर्तित सूजन संबंधी स्थिति को दर्शाता है।
  • यह स्थिति वायु प्रदूषण तथा सिगरेट के धुएं जैसे कारकों से प्रभावित हो सकती है।

यह खोज महत्वपूर्ण क्यों है?

  • फेफड़ों का कैंसर विश्व में कैंसर से होने वाली मृत्यु का प्रमुख कारण है।
  • मौजूदा स्क्रीनिंग कार्यक्रम मुख्यतः धूम्रपान का इतिहास रखने वाले अधिक आयु वर्ग के लोगों तक सीमित हैं, जबकि बढ़ते वायु प्रदूषण के कारण गैर-धूम्रपान करने वाले लोगों में भी इसका जोखिम बढ़ रहा है।
  • ऐसे में यह नया ब्लड सिग्नेचर जोखिमग्रस्त व्यक्तियों की पहले से पहचान कर फेफड़ों के कैंसर की रोकथाम और शीघ्र उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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तमिलनाडु में नीलगिरि तहर की आबादी में वृद्धि


जून 2026 में तमिलनाडु सरकार ने ‘तीसरे समन्वित नीलगिरि तहर सर्वेक्षण’ के परिणाम जारी किए। इसके अनुसार, तमिलनाडु के राजकीय पशु ‘नीलगिरि तहर’ की कुल आबादी अनुमानित रूप से 1,364 दर्ज की गई है।

मुख्य बिंदु

  • सालाना वृद्धि: नीलगिरि तहर की आबादी में साल 2025 (1,303 तहर) के मुकाबले 4.68% की वृद्धि देखी गई है।
  • दीर्घकालिक प्रगति: यदि साल 2024 के आंकड़ों से तुलना की जाए, तो इस नवीनतम अनुमान के अनुसार इसकी कुल आबादी में 32% से अधिक की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
  • अनामलाई पहाड़ियाँ - सबसे मजबूत गढ़: कुल नीलगिरि तहर आबादी का 44.87% हिस्सा अकेले अनामलाई पहाड़ियों (Anamalai Hills) में पाया गया है, जो इसे इस प्रजाति का सबसे बड़ा और सबसे मजबूत प्राकृतिक आवास बनाता है।
  • नीलगिरि क्षेत्र का योगदान: कुल आबादी का 29.25% हिस्सा नीलगिरि क्षेत्र में दर्ज किया गया है।

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कुनो राष्ट्रीय उद्यान में दशकों बाद कैराकल की वापसी


जून 2026 में मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले स्थित कुनो राष्ट्रीय उद्यान में कैमरा ट्रैप सर्वेक्षण के दौरान दुर्लभ जंगली बिल्ली प्रजाति ‘कैराकल’ (Caracal) दर्ज की गई। यह कई दशकों बाद इस क्षेत्र में इसकी पुनः उपस्थिति का संकेत है।

मुख्य बिंदु

  • शारीरिक विशेषता: कैराकल मध्यम आकार की एक जंगली बिल्ली है, जो अपने कानों के ऊपर बने विशिष्ट लंबे काले बालों के गुच्छों (Ear Tufts) और हवा में असाधारण ऊंची छलांग लगाने की क्षमता के लिए जानी जाती है।
  • प्राकृतिक आवास: यह आमतौर पर शुष्क और अर्ध-शुष्क आवासों जैसे कि घास के मैदानों, झाड़ियों वाले क्षेत्रों (Scrublands) और सूखे जंगलों में पाई जाती है।
  • शिकार की आदतें: यह प्रजाति एक कुशल शिकारी है जो मुख्य रूप से पक्षियों, कृंतकों (Rodents/चूहे प्रजाति), खरगोशों और छोटे स्तनधारियों का शिकार करती है।
  • भारत में घटती आबादी: भारत में इस समय कैराकल की आबादी बेहद कम बची है। वन्यजीव विशेषज्ञों के एक अनुमान के मुताबिक, पूरे देश में अब 50 से भी कम कैराकल जीवित बचे हैं।
  • कानूनी सुरक्षा: इसे भारत के वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के तहत सर्वोच्च कानूनी सुरक्षा प्रदान की गई है।

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