पहली बार मिली इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की इजाज़त!
- 12 Mar 2026
11 मार्च, 2026 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 32 वर्षीय व्यक्ति के जीवन रक्षक उपचार को हटाने की अनुमति दी, जो पिछले 13 वर्षों से निष्क्रिय अवस्था (Vegetative State) में था।
मुख्य बिंदु
- मामले की पृष्ठभूमि: मरीज हरीश राणा को अगस्त 2013 में चंडीगढ़ में एक अपार्टमेंट की चौथी मंजिल से गिरने के कारण गंभीर सिर की चोट लगी थी। तब से वह जीवन रक्षक प्रणाली पर था।
- पीठ: न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने उपचार हटाने की अनुमति दी है।
- इसमें क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रिशन (CAN) हटाने की अनुमति भी शामिल है।
- पुनर्विचार अवधि में छूट: सामान्यतः 30 दिन की पुनर्विचार अवधि को माफ कर दिया गया क्योंकि सभी हितधारक उपचार हटाने पर सहमत थे।
- AIIMS की भूमिका: सर्वोच्च न्यायालय ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), नई दिल्ली को मरीज को अपने पैलिएटिव केयर विभाग में भर्ती करने का निर्देश दिया।
- पैलिएटिव केयर योजना: न्यायालय ने निर्देश दिया कि उपचार हटाने की प्रक्रिया मानवीय और गरिमापूर्ण तरीके से की जाए।
- यह निर्णय 2018 के सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के फैसले के अनुरूप है।
- इस फैसले में गंभीर रूप से असाध्य रोगियों के लिए निष्क्रिय इच्छामृत्यु की वैधता को मान्यता दी गई थी।
- लिविंग विल/अग्रिम निर्देश (Living Will/Advance Directive): 2018 के निर्णय में जीवन रक्षक उपचार हटाने के लिए दिशानिर्देश निर्धारित किए गए थे।
- 2023 में संशोधन: जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रिया को सरल बनाया। इसमें मेडिकल बोर्ड की निर्णय प्रक्रिया के लिए समयसीमा तय की गई और न्यायिक मजिस्ट्रेट की भूमिका कम की गई।
- विधायी आवश्यकता: न्यायालय ने कहा कि भारत में अभी तक जीवन के अंतिम चरण की देखभाल पर व्यापक कानून नहीं है और केंद्र सरकार से इस विषय पर कानून बनाने का आग्रह किया गया।
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