कैप्टिव विद्युत संयंत्रों के लिए विद्युत नियमों में संशोधन
- 16 Mar 2026
14 मार्च, 2026 को भारत सरकार ने कैप्टिव विद्युत उत्पादन संयंत्रों से संबंधित विद्युत नियमों में संशोधन किया।
- इसका उद्देश्य नियामकीय अस्पष्टताओं को दूर करना तथा अपने उपभोग के लिए बिजली उत्पादन करने वाले उद्योगों के लिए व्यवसाय सुगमता (ईज ऑफ डूइंग बिजनेस) को बेहतर बनाना है।
मुख्य बिंदु
- विद्युत (संशोधन) नियम, 2026: संशोधनों का उद्देश्य निम्न पहलुओं को स्पष्ट करना है:
- स्वामित्व मानदंड।
- कैप्टिव स्थिति का सत्यापन।
- नियामकीय विवादों में कमी।
- स्वामित्व की परिभाषा में स्पष्टता: अब स्वामित्व की परिभाषा में निम्न संस्थाएँ भी शामिल होंगी:
- सहायक कंपनियाँ
- होल्डिंग कंपनियाँ
- होल्डिंग कंपनी की अन्य सहायक कंपनियाँ (यह उस इकाई से संबंधित होंगी, जो कैप्टिव विद्युत संयंत्र स्थापित करती है।)
- कैप्टिव स्थिति का सत्यापन: नियमों के अनुसार कैप्टिव विद्युत की स्थिति का सत्यापन पूरे वित्तीय वर्ष के आधार पर किया जाएगा।
- शुल्क से संरक्षण: एक नया प्रावधान जोड़ा गया है, जिसके तहत वितरण लाइसेंसधारी कैप्टिव उपभोक्ताओं पर तब तक कोई शुल्क नहीं लगा सकते जब तक कैप्टिव स्थिति का सत्यापन लंबित है।
- शिकायत निवारण तंत्र: संशोधनों के तहत सत्यापन निर्णयों से उत्पन्न विवादों को हल करने के लिए शिकायत निवारण समिति गठित करना अनिवार्य होगा।
- सत्यापन के लिए नोडल एजेंसी: राज्य सरकारें राज्य के भीतर कैप्टिव विद्युत उपभोग के सत्यापन के लिए एक नोडल एजेंसी नामित कर सकती हैं।
- यह व्यवस्था 1 अप्रैल, 2026 से लागू होगी।
- अंतर-राज्यीय सत्यापन: अंतर-राज्यीय कैप्टिव विद्युत उपभोग के मामलों में सत्यापन राष्ट्रीय भार प्रेषण केंद्र (NLDC) द्वारा किया जाएगा।
- सुधार का उद्देश्य: इन परिवर्तनों का उद्देश्य कैप्टिव विद्युत उत्पादन से संबंधित नियमों को आधुनिक कॉर्पोरेट संरचनाओं तथा उद्योगों की बदलती ऊर्जा आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना है।
- कैप्टिव विद्युत का महत्व: राष्ट्रीय विद्युत नीति, 2005 के अनुसार, कैप्टिव विद्युत उत्पादन उद्योगों को विश्वसनीय और लागत प्रभावी विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
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