अप्रयुक्त सेवाओं के लिए शुल्क लेना गलत: सुप्रीम कोर्ट
- 08 May 2026
7 मई, 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि उपभोक्ताओं को उन सेवाओं के लिए भुगतान करने हेतु बाध्य नहीं किया जा सकता, जो उन्हें अब प्राप्त नहीं हो रही हैं। न्यायालय ने पुनः स्पष्ट किया कि सेवा प्रदाता वास्तविक सेवा उपलब्ध कराए बिना शुल्क नहीं वसूल सकते।
मुख्य बिंदु
- सुप्रीम कोर्ट का फैसला: बेंच ने विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण (APTEL) के एक आदेश को रद्द करते हुए कहा कि टैरिफ निर्धारण केवल गणितीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि उपभोक्ता हितों की रक्षा के लिए एक नियामकीय संतुलन है।
- उपभोक्ता संरक्षण का सिद्धांत: कोर्ट ने कहा कि बिजली की आपूर्ति बंद होने के बाद उपभोक्ताओं से बिजली सेवाओं के लिए शुल्क नहीं लिया जा सकता।
- मामले की पृष्ठभूमि: यह विवाद दिल्ली के रिठाला कंबाइंड साइकिल पावर प्लांट की पूंजीगत लागत (Capital Costs) को मूल्यह्रास शुल्क (Depreciation Charges) के माध्यम से वसूलने से संबंधित था।
- APTEL का पिछला आदेश: APTEL ने पहले निर्देश दिया था कि टैरिफ मूल्यह्रास के माध्यम से 15 साल की अवधि में पूरी पूंजीगत लागत वसूल की जाए।
- DERC का रुख बरकरार: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली विद्युत नियामक आयोग (DERC) के आदेश को बहाल कर दिया, जिसने मूल्यह्रास की वसूली को केवल मार्च 2018 तक सीमित कर दिया था (जब बिजली की आपूर्ति समाप्त हुई थी)।
- पावर परचेज एग्रीमेंट (PPA): कोर्ट ने नोट किया कि प्लांट को PPA के तहत केवल 6 साल के लिए बिजली आपूर्ति की मंजूरी दी गई थी।
- विद्युत अधिनियम का संदर्भ: फैसले में विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 61(d) पर प्रकाश डाला गया, जो उचित लागत वसूली के साथ-साथ उपभोक्ता हितों की सुरक्षा को प्राथमिकता देती है।
- न्यायिक महत्व: यह फैसला उपयोगिता विनियमन में उपभोक्ता अधिकारों को मज़बूत करता है और यह सुदृढ़ करता है कि टैरिफ तंत्र वास्तविक सेवा वितरण के अनुरूप होना चाहिए।
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